मंगलवार, 26 जुलाई 2011
अपना मसीहा
एक अरसे से मै माड्ल रोल की तलाश मै था. ऐसी कोई महान हस्ती जिसे मिसाल के तौर पर रखकर मैं अपने चिल्लर को कह सकूं कि देखो बच्चो ऐसे ही लोग महान कहलाते थे. यह एक श्रम साध्य कार्य है. फिर भी मैने हिम्मत नहीं हारी. दूरदर्शन के लहकते चहकते पात्रों में से अपने युगांत पुरुष की खोज प्रारंभ की. श्री राजा जी, दिग्विजय जी, सिब्ब्ल जी आदि आदि कई द्शाननों को देख कर सच मानिए पसीना छूट गया. किसको चुनें किसकॊ छोडें. कुछ चेहरे लुनाई लिए हुए थे- जैसे मनीष तिवारी, नकवी जी. लेकिन वे छवि हीनता से त्रस्त हैं. मौनी बाबा मनमोहन जी, सोनिया मादाम में महान के अक्श ढूंढ्ने की कोशिश की लेकिन वे डी ए वी पी के कलॆडर में ही अच्छे लग रहे थे. स़बसे दुर्भाग्य का विषय यह है कि जो मोडल रोल में जंच रहे हैं वे सरकार को फूटी आंख नहीं सोहाते. हां, उनकी प्रशंसा, तारीफ के पुल तो खूब बनते हैं, कसीदे भी पढे जाते हैं, लेकिन जहां तन्त्र को बदलने की बात आती है तो उनके पसीने छुट्ने लगते हैं. कुल मिला कर नतीजा यह निकला कि इस संक्रमण काल में उपयुक्त होगा कि खुद ही मोडल रोल बना जाए.
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