मंगलवार, 26 जुलाई 2011

अपना मसीहा

एक अरसे से मै माड्ल रोल की तलाश मै था. ऐसी कोई महान हस्ती जिसे मिसाल के तौर पर रखकर मैं अपने चिल्लर को कह सकूं कि देखो बच्चो ऐसे ही लोग महान कहलाते थे. यह एक श्रम साध्य कार्य है. फिर भी मैने हिम्मत नहीं हारी. दूरदर्शन के लहकते चहकते पात्रों में से अपने युगांत पुरुष की खोज प्रारंभ की. श्री राजा जी, दिग्विजय जी, सिब्ब्ल जी आदि आदि कई द्शाननों को देख कर सच मानिए पसीना छूट गया. किसको चुनें किसकॊ छोडें. कुछ चेहरे लुनाई लिए हुए थे- जैसे मनीष तिवारी, नकवी जी. लेकिन वे छवि हीनता से त्रस्त हैं. मौनी बाबा मनमोहन जी, सोनिया मादाम में महान के अक्श ढूंढ्ने की कोशिश की लेकिन वे डी ए वी पी के कलॆडर में ही अच्छे लग रहे थे. स़बसे दुर्भाग्य का विषय यह है कि जो मोडल रोल में जंच रहे हैं वे सरकार को फूटी आंख नहीं सोहाते. हां, उनकी प्रशंसा, तारीफ के पुल तो खूब बनते हैं, कसीदे भी पढे जाते हैं, लेकिन जहां तन्त्र को बदलने की बात आती है तो उनके पसीने छुट्ने लगते हैं. कुल मिला कर नतीजा यह निकला कि इस संक्रमण काल में उपयुक्त होगा कि खुद ही मोडल रोल बना जाए.

शनिवार, 23 जुलाई 2011

nuktachini

हमारा देश भ्रष्टतम देशों में से है। क्या नेता क्या पब्लिक सभी पैसे कमाने की होड़ में लगे हुए हैं। जहाँ पैसे की बात नहीं बनती वहीँ दूसरे तरीके से भ्रष्टता की परिभाषा गढ़ने में लग जाते हैं। कई मुख्यमंत्री इसके घेरे में हैं लेकिन वे बेशर्मी से छाती ठोक कर कुर्सी पर बने रहने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति पर चल कर भ्रष्टाचार के नए उदाहरण बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। बाबु उनके राह कदम पर चलकर सारे तंत्र को बदबूदार बना रहे हैं। जब गीधों की टोली गाँव के करता धर्ता हो जाएँ तो गाँव बसने के सपने कौन देखेगा। यदि न्यायपालिका इसपर डंडे चलाती है तो नेतागण संविधान की दुहाई देकर छिपने की कोशिश करते हैं। सारे मगन हैं भारत के मांस नोचने में। महाभोज में शामिल हैं। लेकिन यदि कुछ कह दिया तो कुत्ते की तरह गुर्राने लगते हैं। कहने वाले देशद्रोही हैं, संसदीय परम्परा को तोड़ने वाले हैं, तानाशाह हैं । चुप होकर अपने अपने मांस नुचवाओ, क्योंकि आप आम आदमी हैं और भूल से आपने गीधों की टोली को, कुत्ते के झुण्ड को न्योता दे दिया है। आम आदमी की गाढ़ी कमाई, वो जो मिटटी गाड़े में काम करते हैं, बोझ उठाकर परिवार पालते हैं, वे हाशिये पर भी नहीं रहेंगे, वे तिल तिल मरने के लिए अभिशप्त हैं। प्रजातंत्र जिंदाबाद, हमारा संसद जिंदाबाद।

सोमवार, 11 जुलाई 2011

शुन्य से सिफर तक

एक दिन मे दो गाडियों का हाद्सा. घायल पडे लोगों का दर्दनाक मंजर. आंखें गीली हैं, शर्मसार भी. भला अपने देश में आपदा प्रबंधन इतना लचर क्यों है. दुर्घटना घटने के दो -तीन घंटे के बाद सरकारी अमला हरकत में आती है. उनके आने से पहले आस-पास गांव घर खेत खलिहान से जुडे लोग मदद के लिए दौड पड्ते हैं. लेकिन उनके पास पर्याप्त साधन नहीं होता. तब तक यात्रियों की चीख पुकार हवा में तैरती रहती है. सरकारी अमला म्यूजिकल चेयर के खेल की तरह आरोप-प्रत्यारोप की गेंद दूसरे के पाले में फेंकती रहती हैं. मरने वालों को कम से कम बताने की कवायद चलती रहती है ताकि मुवावजे कम से कम बंटे. संवेदना पत्र जारी करने हैं, जांच समिति बैठानी है, न्यूज चैनल को टी आर पी बटोरनी है, विपक्ष को मानसून सत्र में दो दो हाथ करने हैं. यक्ष प्रश्न है- तंत्र और व्यवस्था के साथ आम आदमी का सफर कितनी दूर तक है. यह सफर शुन्य से सिफर तक का है.

रविवार, 10 जुलाई 2011

अन्ना हजारे बेचारे क्या करेंगे? यहाँ तो टोकरी के सारे सेब सड़े हैं। हम निर्लज्ज भी हैं, भ्रष्ट भी और उन्हें कायम रखने के लिए प्रयास रत भी। हम छाती थोक कर कहते हैं कि हम भ्रष्ट हैं, टीवी पर जेल जाते हुए हाथ हिलाते हैं, जनता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखती है, उनके जेल जाने पर आंसू बहाती है, वे हमारे नेता हैं, हमने उन्हें पांच साल के लिए जनता की छाती चीड कर खून पीने का न्योता दे रखा है। वे चुने हुए प्रतिनिधि हैं और उन्हें पांच साल के लिए भारत देश को बेच कर अपना घर भरने की छूट है।

सच्चाई कितनी

हमारा देश कई पटरियों पर दौड रहा है. एक ओर भ्रष्ट तंत्र है तो दूसरी ओर उसके खिलाफ झंडा बुलद करने वाले चद युवक हैं. यहां प्रजातन्त्र है, राजतंत्र है, साम्यवाद है, मार्क्स है, अराजकतावादी हैं, गद्दार भी हैं तो नमक हलाल भी. सभी का स्वागत है.