गुरुवार, 4 अगस्त 2011

प्रजातंत्र

एक राजा था जिसकी प्रजा बहुत दुखियारी थी। यद्यपि लोगों को खाने पीने ओढ़ने पहनने की कोई कमी नहीं थी फिर भी सभी दुखी थे । यह इसलिए था कि लोगों को रोज सबेरे उठकर राजा की जय राजा की जय कहना पड़ता था। जनता अपने सगे संबंधियों के नाम तक भूल गयी थी। सभी के जुबान पर राजा का नाम चस्पा हो गया था। एक समय ऐसा आया कि वहाँ की सभी चीजों के नाम बदल गए। लोग वहाँ राजा खाने लगे, पहनने लगे, ओढ़ने लगे, बिछाने लगे। मैयत राजा की निकलती और जलाने वाले राजा ही होते। इस तरह का माहौल था कि बाहर के देश वहाँ की लोकतांत्रिक तथा समानतावादी कार्यशैली देखकर हैरान थे। लेकिन वहाँ की प्रजा चलती फिरती लाश में तब्दील हो गयी थी। उसे अपने दुःख का आभास भी नहीं था। इस प्रकार वे विमुक्त प्राणी कहलाने लगे।