सोमवार, 11 जुलाई 2011
शुन्य से सिफर तक
एक दिन मे दो गाडियों का हाद्सा. घायल पडे लोगों का दर्दनाक मंजर. आंखें गीली हैं, शर्मसार भी. भला अपने देश में आपदा प्रबंधन इतना लचर क्यों है. दुर्घटना घटने के दो -तीन घंटे के बाद सरकारी अमला हरकत में आती है. उनके आने से पहले आस-पास गांव घर खेत खलिहान से जुडे लोग मदद के लिए दौड पड्ते हैं. लेकिन उनके पास पर्याप्त साधन नहीं होता. तब तक यात्रियों की चीख पुकार हवा में तैरती रहती है. सरकारी अमला म्यूजिकल चेयर के खेल की तरह आरोप-प्रत्यारोप की गेंद दूसरे के पाले में फेंकती रहती हैं. मरने वालों को कम से कम बताने की कवायद चलती रहती है ताकि मुवावजे कम से कम बंटे. संवेदना पत्र जारी करने हैं, जांच समिति बैठानी है, न्यूज चैनल को टी आर पी बटोरनी है, विपक्ष को मानसून सत्र में दो दो हाथ करने हैं. यक्ष प्रश्न है- तंत्र और व्यवस्था के साथ आम आदमी का सफर कितनी दूर तक है. यह सफर शुन्य से सिफर तक का है.
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