सुबह तेजी से आती है. रात सन्नाटे की चादर ओढ़ कर पसरी रहती है. सिर्फ एक टिटिहरी की आवाज सन्नाटे को चीरती है. हाँ कभी कभार रेल की धमक भी मौन की भाषा को तोडती है. ठण्ड ने वैसे भी पेड़ पौधों को हलकान किया हुआ है. वे भी सुबह की ताजा ओश की बूंदों से नहाए हुए हैं. अब थोड़ी देर में आवाजों का बोलबाला होगा. चिड़ियाँ अपने अपने घोसलों में जाग जायेगी. वहीं से वह ची ची करती हुई अपने अपने रिश्ते नातों को जगाएगी. फिर बड़े पक्षियों की बारी आएगी. उन्हें भी हमारी बीमारी लगी हुई है. बड़ी मुश्किल से वे पंख खोलते हैं. छोटी चिड़ियाँ तो घर आंगन में ही फुदकती रहेगी, लेकिन बड़े पक्षी दूर तक उड़ने के लिए अपने पंख तौलते रहेंगे. प्यासी मिट्टी ओस से भींग कर अपनी प्यास बुझाती है. उसे भी अपने रचना का संसार चलाना है. मिट्टी में स्पंदन है, जीवन का स्वर है. वह धरती के फलक पर चित्र विचित्र रंगों की दुनिया बुनती है. आज कोई शीर्ष कमीटी की मीटिंग है. कौए मैंने बिजली के पोल पर, उनके तारों पर पंक्ति में बैठने लगे हैं. वे अपनी अपनी भाषा में किसी अजेंडा पर विचार करने में लगे हैं. लेकिन इनकी आवाज में भी मौन की स्वीकृति है. मौन भी साक्षी होकर उन्हें देख रही है. लेकिन यह ज्यादा देर नहीं चलने वाला. यह जो दो पाया जानवर है, जल्द ही उठ जाएगा. फिर मौन भी घने जंगल में छिप जायेगी. मनुष्य पहले अपने अहंकार को जगायेगा, पृथ्वी पर उत्कृष्ट प्राणी होने का दम भरेगा, प्रकृति को सब तरह से निचोड़ने का संकल्प लेगा, अपने उथले विचारों का महिमा मंडन करेगा, आवाज और चिल्ल पों का प्रदूषण फैलाएगा. फिर फैल जायेगी स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की भीषण लड़ाई. प्रकृति चुपचाप असहाय होकर अपने रचित इस विचित्र प्राणी के कारनामों को देख देख कर आंसू बहायेगी.
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
रविवार, 29 जनवरी 2012
आम और ख़ास
अकेले हैं और बेबस हैं, अरे अब आप आम हैं
बुझे हैं थके हैं, अरे अब आप आम हैं
लुटे हैं, पिटे हैं, खड़े भी मगर हैं,
अरे अब आप आम हैं
लुढ़कते पलटते मगर फिर ठहरते
अरे अब आप आम हैं
फिसलते संभलते कहीं रुक भी जाते
अरे अब आप आम हैं
मचलते ठहरते झिझकते सहमते
अरे अब आप आम हैं
चढ़ते चढाते सभी कुछ गिराते
अरे अब आप ख़ास हैं.
न रुकते, न गिरते गिराते मगरहैं
अरे अब आप ख़ास हैं.
डपटते धमकाते कचूमर बनाते
अरे अब आप ख़ास हैं.
स्विस में हैं खाते भारत को खाते
जहाँ भी वे जाते, भरपेटखाते
अरे अब आप बाप हैं.
बुझे हैं थके हैं, अरे अब आप आम हैं
लुटे हैं, पिटे हैं, खड़े भी मगर हैं,
अरे अब आप आम हैं
लुढ़कते पलटते मगर फिर ठहरते
अरे अब आप आम हैं
फिसलते संभलते कहीं रुक भी जाते
अरे अब आप आम हैं
मचलते ठहरते झिझकते सहमते
अरे अब आप आम हैं
चढ़ते चढाते सभी कुछ गिराते
अरे अब आप ख़ास हैं.
न रुकते, न गिरते गिराते मगरहैं
अरे अब आप ख़ास हैं.
डपटते धमकाते कचूमर बनाते
अरे अब आप ख़ास हैं.
स्विस में हैं खाते भारत को खाते
जहाँ भी वे जाते, भरपेटखाते
अरे अब आप बाप हैं.
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
सच्चा गणतंत्र
आज प्रजातंत्र का उल्लास है. लोग सड़कों पर खड़े होकर झांकियां देख रहे हैं. देश के शहीदों को याद किया जा रहा है. यह देखो हवाई जहाज कैसे कुलाचे भर रहा है. हमारा भारत महान है. विविधता इसकी संस्कृति है. लेकिन आँखें नम हैं, हम कैसे इतने बड़े जहाज को डुबाने के लिए श्रम कर रहे हैं.
कुमकुम लेपूं किसे सुनाऊँ किसको कोमल गान
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान
आज हमारी सीमा को लांघने का प्रयास किया जा रहा है. हमें ग़ुरबत में रखने के लिए घर के भेदिये ही प्रयत्न कर रहे हैं. हम लालची निगाहों से डालर को देखते हैं. हमारे भविष्य चंद विकसित देश तय कर रहे हैं. गांधीजी का यह देश उनके बताये मार्गों को भूल गया. हम धीरे धीरे मानसिक और आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं. नैतिक पतन तो कई दशक पहले हो गया. दोस्तों, यह समय अपना अपना देखने का नहीं है. हम जात बिरादरी से ऊपर हैं, हम प्रांतीय नहीं हैं, भारतीय हैं और सिर्फ भारतीय. विविधता हमें तोड़ने के लिए नहीं, हमें अपने पर गर्व करने के लिए है. हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर देश और सिर्फ देश के लिए काम करना होगा. हम किसी पार्टी का समर्थन न करें, सिर्फ चरित्रवान व्यक्तियों को आगे लायें जिनमे घर भरने की लालसा न हो. हम सिर्फ विरोध के लिए विरोध न करें, दुखितों अनाश्रितों और असहायों की सहायता करें. उनके दुःख को अपना दुःख समझें. हमें अपने समाज से टूटते हुए ताने बाने को फिर से संवारना है. दोस्तों, यदि कोई आपके राज्य में तंगहाली से मर रहा है या भूख और गर्दिश का शिकार हो रहा है, तो यह आपकी जिम्मेदारी है, उसके दुःख को दूर करने की, उसकी खोयी अस्मिता लौटाने की. सिर्फ सरकार और शासन का मुंह जोहने से काम नहीं चलेगा. हमारी निष्क्रियता ही हमारे देश की बर्बादी का कारण है. हमें जरूरत है स्वामी विवेकानंद की, भगत सिंह की, ऐसे चरित्र वान की जो देश के लिए फना हो सकें. हमें धन्नासेठों की आवश्यकता नहीं है, नहीं चाहिए हमें फोर्ब्स में दर्ज चंद शोषकों के नाम, ये अट्टालिकाएं, करोड़ों के कार और स्विस बैंकों में जमा अकूत खजाना जो किसानों बेबस मजदूरों के खून से सने हैं. उन्हें दोजख मिलेगा. भाड़ में जाएँ उनकी काली करतूत. हमें आस पास की दुनिया को संवारना है. लोगो के झूठे नारों में नहीं आना है. हम देश के नागरिक हैं, उसके हवा पानी मिट्टी से रचे बसे हैं, मुझे ही अनाथों की सहायता करनी है, देश के नागरिक के दुखों को अपना दुःख समझना है. तभी देश सच्चे स्वर्णिम भविष्य के लिए आगे कदम बढ़ा सकेगा.
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