सोमवार, 31 दिसंबर 2012

तोड़ो कारा

हम संस्कृति के क्षरण की बात करते हैं, लेकिन उसके कारण तक जाने का प्रयत्न नहीं करते हैं। क्योंकि उसके क्षरण में हमारी भी साझेदारी है। आज जिस अपसंस्कृति की हम बात करते हैं, वह एक दिन की बात नहीं है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे छीजने जैसी है। अवमूल्यन को जब शासन और सत्ता बढ़ाने लगे तो उन्हीं के द्वारा मूल्यों की वकालत करना बेमानी सा लगता है। बलात्कार-मोलेस्टेशन की बात करते हैं, फिर हम सेन्सीटाइजेशन की बात करते है, लेकिन हम यह नहीं देखते कि बचपन से ही युवावर्ग किस अपसंस्कृति में पल बढ़ रहे हैं। आज सेक्स की लाखों साइट्स उपलब्ध हैं, जो बाल मन को विकृत कर रही है। हम उनपर रोक नहीं लगाते। क्या पता, इसमें करोड़ों का वारा-न्यारा हो रहा हो। नुक्कड़ पर शराब की बिक्री बढ़ रही है, छोटे-छोटे पाउच में भी उपलब्ध है, सरकार का राजस्व इससे ऊंचाई छू रहा है। फिर हम अपसंस्कृति की दुहाई देते नहीं थकते। व्यवस्था के समांतर अव्यवस्था का ताना-बाना बुन रहे हैं और युवाओं के स्वर्णिम भविष्य की कल्पना कर रहे हैं।  हम विडंबनाओं में जीने के लिए मजबूर हैं। हमने वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर युवाओं को भट्ट कैंप के ब्लू फिल्म परोसा है, सिस्टम को खराब करने का सारा दायित्व जैसे प्रशासन ने ही ले रखा हो। 

आशा है युवा वर्ग इस अपसंस्कृति को बढ़ने नहीं देंगे।  उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ये मरीचिकाएं उनके तेज और ओज छीनने का षडयंत्र है, ताकि  वे फिर से गुलाम बन सकें।  अपसंस्कृति के साँप को और उनके संपोलों को कुचल डालो।  शराब माफिया- सेक्स माफिया-शासन तंत्र के गठजोड़ को तोड़ डालो। उन सभी नकारात्मक शक्तियों का पुरजोर विरोध करो जो आपकी बहनों के इज्जत को तार तार कर रहा है- आपको गुलाम बना रखा है। उन सभी बुराइयों का डटकर विरोध करें जो परिवार-समाज-प्रांत-देश को पथभ्रष्ट कर रहा है। 
                                           कौन कहता है आसमाँ में छेद नहीं होता
                                           एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
 

रविवार, 23 दिसंबर 2012

 
CONFESSION
 
आज नेतृत्व का अभाव ज्यादा ही नजर आ रहा है। नेता घर-घुसना हो गए हैं, उन्होंने कमस खाई है कि वे जन प्रतिनिधि (?) से ही बात करेंगे। इसीलिए वे अपने कमरे में बुलाते हैं, गुटर गूं करते हैं। इस वार्तालाप का कोई असर नहीं पड़ता है। जहाँ भी़ड़ हो, वहाँ जाने से घबराते हैं। ये किस तरह के नेता हैं ? दिल्ली के बच्चे सड़क पर हैं और फरियाद कर रहै हैं। कोई सुनने-बूझने वाला नहीं। आखिर यह किस तरह की अपरिपक्वता है? आज के नेता भाड़े की भीड़ को ही संबोधित कर सकते हैं। दिल्ली की सड़कों पर कुहराम मचा हुआ है, सभी नेता, हुक्मरान घर में दुबके हुए हैं। बच्चे चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं- वे सुनी अनसुनी कर रहे हैं। बाद में कोई बच्चा हिंसा पर आमदा हो जाए तो उसे असामाजिक तत्व कह कर लाठी चार्ज करेंगे। है न अजीब नेता के व्यवहार? फिर पुलिस को गलत ठहराने की कोशिश करेंगे। भला वे क्या करें? कई दिनों से परेशान, भीड़ को ढकेलते ढकेलते चिड़चि़ड़े हो गए हैं। उन्हें नेता का दायित्व निभाना पड़ रहा है। और नेता हैं, जो मीडिया से ही बात कर सकते हैं, उन्हें बच्चों से क्या लेना देना? वे प्रचार के भूखे हैं। मीडिया भी टी आर पी के चक्कर में फँसे पड़े हैं। विज्ञापन और विज्ञापन- इससे बढ़कर न भारत है, न उनकी देशभक्ति। आज हम खोखले हो गए हैं और अपने युवाओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाने चले हैं।
 
बच्चों माफ करो, हम तुम्हारे माडल रोल नहीं हैं, हमने तुम्हें  देश के कूड़े में फेंक दिया है। हम तुम्हें टकसाल समझ रहे हैं, जो भविष्य में हमारा घर पैसे से भर देंगे। ये जो दिखावे की  दयालुता है वो सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए है।  
 
नेताओं हमने आपका कमीनापन देख लिया है, आप लुटियन जोन में बैठे रहें, सुरक्षा के परत दर परत का मजा लेते रहे हैं- आम जनता तो चंद ठुल्ले पुलिसिआ के लिए छोड़ दें। देखिए आपका लक्ष्य है भारत को मुर्दा बनाना- फिर बड़े चाव से नोच नोच कर खाएं। सारे धतकरम आपके हिस्से। भला आप कूड़ेदान जो हैं।
 
लड़कियों, आप स्वयं ही माता हैं। हमने आपकी मूर्ति बनाकर पूजा पाठ शुरु कर दी है। लेकिन हाड़ माँस के भूखे हैं। नैतिकता इतिहास है वो हमारी गढ़ी गई परिभाषा है, जिससे हम भेड़िए की खाल में सुरक्षित रह सकें। हमने आपको सड़क पर छोड़ दिया है। आप अपना भविष्य खुद लिखें- सजाएं सवारें हमसे आशा न करें। लेकिन हमारे पास कई अस्त्र हैं- उनसे बचें। जैसे कि अराजक तत्व- नक्सलाईट-देश द्रोही। इन्हें सिद्ध करने के लिए हमारे पास पुलिस है, कई मानदंड हैं- और कानून की मोटी-मोटी पुस्तक हैं- जिसके अंतर्गत आप लपेट लिए जाएंगे।
 
न्यायालय, आप धन्य हैं। आप महाराजा टोडरमल के वंशज हैं। पुश्त दर पुश्त आपके दर पर न्याय की जोत जलाने के लिए हम आते हैं। वहीं गल सड़ जाते हैं। आप न्याय गढ़ने में एक सदी बिता देते हैं।  कानून- आपकी विद्वता- आपकी लेखन शैली धन्य है। आप मुजरिमों को शरण देते हैं - वकीलों के मार्फत। हे मौलिक अधिकार के संरक्षक ! यह शब्द ही लुप्त प्राय हो गया है- फिर काहे के संरक्षक।
 
पुलिस भाइयों, आप इधर कुँआ, उधर खाई में फँसे पड़े हैं। बड़ों को संरक्षण न दो तो मरे। उनके सारे धतकरमों में आपको साथ देना आपकी मजबूरी है। सिस्टम चाहे गला-सड़ा हो, उसके साथ जुड़ना आपकी आजीविका है- भला रोटी का सवाल आपसे भी तो जुड़ा है। यह जो विवशता है, उसने आपको त्रिशंकु बना दिया है। आप सिस्टम के रोबोट हैं- आपको कोई मनुष्य नहीं समझता।
 
हे कारपोरेट जगत ! असल में आप ही नाच नचैया हैं। भविष्य हैं ग्लोबल विश्व के। आप रुपया कमाएं, देश को नेताओं के सहयोग से गिरवी रखें,  हमें रोबोट बनाएं- जी में जो आए करें। मालिक आप हैं, अन्नदाता। यह जो हवा है, पानी है, हमारी एक एक साँस है- वो आपकी थाती है। काहे का देश- आप तो ग्लोबल हैं, चाय लंदन में तो डिनर न्यूयार्क में। यह जो सो काल्ड भारत माता है- अनपढ़ गँवार की सोच है। आप ठहरे गिटपिट अंग्रेजी बोलने वाले। संस्कृति से क्या लेना-देना। डुबाइये नैतिकता को- संस्कृति को अरब सागर में- और फिर डूब मरिए चुल्लू भर पानी में।  आपको साष्टाँग दंडवत्।
 
बच्चों एक बार फिर से, माफ कीजिए। हमने आपको कोई विरासत नहीं दी। लेकिन आपके जोश-होश सबके कायल हैं। आपको अपना वर्तमान खुद लिखना है- भविष्य खुद गढ़ना है। आप स्वयं विवेकानंद बनिए- झांसी की रानी बनिए। आप नींव का काम कीजिए, एक सुखद भारत की कल्पना कीजिए और फिर से नव निर्माण कीजिए। हमारे पास आपके लिए सिर्फ उपदेश हैं- सिर्फ उपदेश। माफ कीजिए हमने आपको केवल खँडहर दिया है- अधखाया विरासत दिया है।    
 
 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

इश्वर अनुभव

भाषा की विभिन्नता ने जहाँ हमें मानसिक रूप से उन्नत बनाया, शब्दों की संप्रेशंता  को सटीक बनाया, वहीँ कुछ  कन्फ्यूजन भी पैदा कर गया.  सही ढंग से वस्तुओं या किसी कार्य प्रणाली को समझने समझाने का तरीका शब्द के आडंबरों ने ढँक लिया.  यह तब हुआ जब हमने बुद्धि का उपयोग शब्दों का प्रयोग अहंकार को बढाने के लिए करना शुरू किया.  एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाएगा.  इश्वर को ही लें.  वे परम सत्ता हैं और अपनी जगत सत्ता में वे चेतनता के रूप में रहते हैं.  जाहिर हैं उससे संपूर्ण ब्रह्माण्ड ओत प्रोत है. जड़ जंगम और अणु परमाणु भी उनसे अछूते नहीं हैं.  वे कारण स्वरुप हैं अतः उससे उत्पन्न कार्यस्वरूप भी उन्हीं का रूप है.  अब चूंकि वे सर्व विद्यमान हैं उसे स्पष्ट करने के लिए जो ताना बाना बुना गया वह समझने समझाने से बहुत दूर चला गया.  जैसे वे वृहद और सूक्ष्म हैं - वे अस्ति और नास्ति हैं- कारण और कार्य हैं- वे जल-थल-नभ में हैं- आदि आदि. अब शब्दों और उनके विलोमों का प्रयोग इश्वर को समझाने में इतना हुआ कि इश्वर ही कहीं खो गए और शब्दों के जाल में फँस गए.  यानि कि इश्वर जो सहज है उन्हें शब्दालंकार ने असहज कर दिया.  

इश्वर समझने की नहीं महसूस करने की बात है. उसे शब्दों में जितना बांधेंगे वे आपसे दूर होते चले जायेंगे- वे सूक्ष्म में अपने गुणों एवं कारण स्वरुप में हैं- जिन्हें खींच खींच कर हमने दुरूह बना दिया है.  ब्रह्माण्ड और संपूर्ण सृष्टि चेतन है- अतुलनीय है और तुलनात्मक रूप में नहीं है.  लेकिन समझाने के लिए हम एक दुसरे से तुलना करने लगते हैं और वहीँ हम विषय से भटक जाते हैं.  फिर अनुभव की सीमा भी है- आप का शरीर सीमित है और सीमा के अंतर्गत ही आपका अनुभव है. अब अपनी सीमा को न पहचानकर बुद्धि विलास का प्रयोग करने लगते हैं.  आपके सारे कांसेप्ट आपकी सीमा के अंतर्गत हैं- अतः आप अपनी सीमा में ही इश्वर को पहचानने का दंभ भर  सकते हैं.  अतः आवश्यक है- महसूस करने को ही विस्तार दें- अपनी सीमा को ही जहाँ तक हो सके -खीचें और यह मान कर चलें कि शरीर मन-बुद्धि से हम सीमित अर्थों में ही इसे पहचान सकेंगे.  पहचानना एक छुअन भर - इससे बढ कर कुछ भी नहीं- जिन्हें समझना चाह रहें हैं- उन्हें ही समझाने दें- तब बात बनेगी.  इत्यलम
   

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

दिन का रोजनामचा

सुबह तेजी से आती है. रात सन्नाटे की चादर ओढ़ कर पसरी रहती है. सिर्फ एक टिटिहरी की आवाज सन्नाटे को चीरती है. हाँ कभी कभार रेल की धमक भी मौन की भाषा को तोडती है. ठण्ड ने वैसे भी पेड़ पौधों को हलकान किया  हुआ  है. वे भी सुबह की ताजा ओश की बूंदों से नहाए हुए हैं. अब थोड़ी देर में आवाजों का  बोलबाला होगा. चिड़ियाँ अपने अपने घोसलों में जाग जायेगी. वहीं से वह ची ची करती हुई  अपने अपने रिश्ते नातों को जगाएगी. फिर बड़े पक्षियों की बारी आएगी. उन्हें भी हमारी बीमारी लगी हुई है. बड़ी मुश्किल से वे पंख खोलते हैं. छोटी चिड़ियाँ तो घर आंगन में ही फुदकती रहेगी, लेकिन बड़े पक्षी दूर तक उड़ने के लिए अपने पंख तौलते रहेंगे. प्यासी मिट्टी ओस से भींग कर अपनी प्यास बुझाती है. उसे भी अपने रचना का संसार चलाना है. मिट्टी में स्पंदन है, जीवन का स्वर है. वह धरती के फलक पर चित्र विचित्र रंगों की दुनिया बुनती है. आज कोई शीर्ष कमीटी की मीटिंग है. कौए मैंने बिजली के पोल पर, उनके तारों पर पंक्ति में बैठने लगे हैं. वे अपनी अपनी भाषा में किसी अजेंडा पर विचार करने में लगे हैं. लेकिन इनकी आवाज में भी मौन की स्वीकृति है. मौन भी साक्षी होकर उन्हें देख रही है.  लेकिन यह ज्यादा देर नहीं चलने वाला.  यह जो दो पाया जानवर है, जल्द ही उठ जाएगा. फिर मौन भी घने जंगल में छिप जायेगी. मनुष्य पहले अपने अहंकार को जगायेगा, पृथ्वी पर उत्कृष्ट प्राणी होने का दम भरेगा, प्रकृति को सब तरह से निचोड़ने का संकल्प लेगा, अपने उथले विचारों का महिमा मंडन करेगा, आवाज और चिल्ल पों का प्रदूषण फैलाएगा. फिर फैल जायेगी  स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की भीषण लड़ाई. प्रकृति चुपचाप असहाय होकर अपने रचित इस विचित्र प्राणी के कारनामों को देख देख कर आंसू बहायेगी.

रविवार, 29 जनवरी 2012

आम और ख़ास

अकेले हैं और बेबस हैं, अरे अब आप आम हैं
बुझे हैं थके हैं, अरे अब आप आम हैं
लुटे हैं, पिटे हैं, खड़े भी मगर हैं,
अरे अब आप आम हैं
लुढ़कते पलटते मगर फिर ठहरते
अरे अब आप आम हैं
फिसलते संभलते कहीं रुक भी जाते 
अरे अब आप आम हैं
मचलते ठहरते झिझकते सहमते 
अरे अब आप आम हैं
चढ़ते चढाते  सभी कुछ गिराते
अरे अब आप ख़ास हैं.
न रुकते, न गिरते गिराते मगरहैं
अरे अब आप ख़ास हैं.
डपटते धमकाते कचूमर बनाते
अरे अब आप ख़ास हैं.
स्विस में हैं खाते  भारत को खाते
जहाँ भी वे जाते, भरपेटखाते
अरे अब आप बाप हैं.





गुरुवार, 26 जनवरी 2012

सच्चा गणतंत्र

 
आज प्रजातंत्र का उल्लास है. लोग सड़कों पर खड़े होकर झांकियां देख रहे हैं. देश के शहीदों को याद किया जा रहा है. यह देखो हवाई जहाज कैसे कुलाचे भर रहा  है. हमारा भारत महान है. विविधता इसकी संस्कृति है. लेकिन आँखें नम हैं, हम कैसे इतने बड़े जहाज को डुबाने के लिए श्रम कर रहे हैं.
कुमकुम लेपूं किसे सुनाऊँ किसको कोमल गान
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान
आज हमारी सीमा को लांघने का प्रयास किया जा रहा है. हमें ग़ुरबत में रखने के लिए घर के भेदिये ही प्रयत्न कर रहे हैं. हम लालची निगाहों से डालर को देखते हैं. हमारे भविष्य चंद विकसित देश तय कर रहे हैं. गांधीजी का यह देश उनके बताये मार्गों को भूल गया.  हम धीरे धीरे मानसिक और आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं. नैतिक पतन तो कई दशक पहले हो गया. दोस्तों, यह समय अपना अपना देखने का नहीं है. हम जात बिरादरी से ऊपर हैं, हम प्रांतीय नहीं हैं, भारतीय हैं और सिर्फ भारतीय.  विविधता हमें तोड़ने के लिए नहीं, हमें अपने पर गर्व करने के लिए है. हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर देश और सिर्फ देश के लिए काम करना होगा. हम किसी पार्टी का समर्थन न करें, सिर्फ चरित्रवान व्यक्तियों को आगे लायें जिनमे घर भरने की लालसा न हो.  हम सिर्फ विरोध के लिए विरोध न करें, दुखितों अनाश्रितों और असहायों की सहायता करें. उनके दुःख को अपना दुःख समझें. हमें अपने समाज से टूटते हुए ताने बाने को फिर से संवारना है. दोस्तों, यदि कोई आपके राज्य में तंगहाली से मर रहा है या भूख और गर्दिश का शिकार हो रहा है, तो यह आपकी जिम्मेदारी है, उसके दुःख को दूर करने की, उसकी  खोयी अस्मिता लौटाने की.  सिर्फ सरकार और शासन का मुंह जोहने से काम नहीं चलेगा. हमारी निष्क्रियता ही हमारे देश की बर्बादी का कारण है. हमें जरूरत है स्वामी विवेकानंद की, भगत सिंह की, ऐसे चरित्र वान की जो देश के लिए फना हो सकें. हमें धन्नासेठों की आवश्यकता नहीं है, नहीं चाहिए हमें फोर्ब्स में दर्ज चंद शोषकों के नाम, ये अट्टालिकाएं, करोड़ों के कार और स्विस बैंकों में जमा अकूत खजाना जो  किसानों बेबस मजदूरों के खून से सने हैं. उन्हें  दोजख मिलेगा. भाड़ में जाएँ उनकी काली करतूत.  हमें आस पास की दुनिया को संवारना है. लोगो के झूठे नारों में नहीं आना है. हम देश के नागरिक हैं, उसके हवा पानी मिट्टी से रचे बसे हैं, मुझे ही अनाथों की सहायता करनी है, देश के नागरिक के दुखों को अपना दुःख समझना है. तभी देश सच्चे स्वर्णिम भविष्य के लिए आगे कदम बढ़ा सकेगा.