आज महिला दिवस है। मुझे लगता है जब कुछ छीजने लगता है, तो दिवस मनाने लगते हैं जिससे कि कम से कम हम अचेतन रुप से ही सही उसका महत्त्व जान सके। ऐसा अनुमान है कि भविष्य में महिला अपने दिवस से ही जानी जाएगी। विश्व भर में महिला आज अपसंस्कृति का शिकार हो रही हैं। वह उपभोग्या हैं, जो बाजारवाद की देन है। उनका आकर्षण ही उनके विनाश का कारण है। पुरुष माचो बनना चाहता है, शक्ति प्रदर्शक होना चाहता है और यही महिलाओं का दुर्भाग्य है। स्त्री भी बार-बार ठगाने के लिए अभिशप्त है। उसकी कमजोरी है कि वह हृदय की भाषा जानती है। कोई भी अपनापन उसे मुग्ध कर देता है, पुरुष नाटक का पात्र बनकर उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाता है।
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