चुनाव सिर पर है। प्रजातंत्र का यह पर्व अद्भुत है। विश्व में यह पर्व सभी दांतो तले उंगली दबाए देखते है। इतना विशाल देश, अपार मानव-शक्ति और इतने सारे इंतजाम, आसान नहीं है संभालना। लेकिन सारे ताम झाम प्रजातंत्र के नाम पर करना पड़ता है। कितने ही अभ्यर्थी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैॆ और यह सारा नाटक देश के लोगों को दुख दूर करने के लिए हो रहा है। आप कहेंगे जब सभी उम्मीदवार देश के हितार्थ काम करने के लिए एक जुट हो रहे हैं, तो भी देश में समस्याएं क्यों हैं? स्पष्ट है ये अपने हित साधने के लिए जुटे हैं, देश के हित का प्रश्न ही नहीं है। एम. एल. ए. या एम. पी. आदि का चुनाव नेताओं को आकर्षित करता है, क्योंकि इसमें बिना किसी उत्तरदायित्व के पैसा बनाने का साधन है, रुसूख है, लोकप्रियता है, राजा होने का आभासी सुख है। यदि किसी भी सेवा के समान नेतागिरी को भी जिम्मेदारी से जाे़ड़ दें, फिर देखिए टिकट की मारामारी दूर हो जाएगी। यदि एक एम.पी. या एम.एल.ए. के क्षेत्र में कोई किसान आत्महत्या करे, तो जनप्रतिनिधियों पर एफ आई आर दर्ज हो, समाज में विसंगति उनके कार्यकाल में बढ़ा हो तो उन्हें गर्त में ढकेलने का जिम्मेदार माना जाए तथा उनपर कार्रवाई हो सके, उनके आय-व्यय के लेखा जोखा मासिक हो साथ ही उन्हें उनके ही क्षेत्र में 300 दिन रहने का फरमान हो. तो देखिए क्या रंग लाता है। उम्मीदवार ढूंढे न मिलेंगे। लेकिन इसके लिए सामाजिक जागरुकता भी आवश्यक है। जनता वोट देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न समझ लें। इन्हें सान पर चढाए रखें, तभी प्रजातंत्र पल्लवित पुष्पित हो सकेगी।
समस्या तब पैदा होती है, जब इन्हें राजा की तरह मानने लगते हैं। गाड़ी-घोड़ा-शानो शौकत-बंगला-ठाट-बाट इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, तब प्रजातंत्र पतनोन्मुखी हो जाता है। नेतागिरी को उतना ही कर्तव्य परायणता से जोड़ा जाए, जितना एक सेना के जवान को जोड़ते हैं । भला जनप्रतिनिधि होना सुख का कारण कैसे हो सकता है, उसे जनता का दुख अपना दुख दीखे-न दिखता हो तो उसे दिखाया जाए, तभी सही मायने में देश का कल्याण होगा। हाँ एक बात और भी है। जनता को भी नेताओं के परिवार वालों की सुध लेनी चाहिए। ऐसा न हो कि जनप्रतिनिधि तो जन सेवा से जुड़े हैं, उनके परिवार वाले देशभक्ति की बानगी से छले जाएं। जहां नेता जनता के लिए सोचे, वहीं वहाँ की जनता जनप्रतिनिधियों के परिवार के लिए सोचे, उन्हें फौजियों की बच्चों की तरह अनाथ होने के लिए न छोड़े-तभी देश का कल्याण है। सेना और जनप्रतिनिधि देश की सेवा से जुडे़ हैं, उनके परिवार की चिंता सरकार की होनी चाहिए।
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