शनिवार, 8 मार्च 2014

स्वानुभूति

अध्यात्म के क्षेत्र में जितनी गदहपचीसी है, उतना किसी भी क्षेत्र में नहीं है। नए-नए विचार हैं, शब्दों का समूह है, वाग्जाल का विस्तार है, तरह तरह के विधि-विधान हैं और साथ-साथ सुख भोगने की असीम लालसा है। अध्यात्म के पीपासु भीड़तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं, वे कपि वत एक डाल से दूसरी डाल पर छलांग लगाते रहते हैं, लेकिन अंततोगत्वा कुछ नहीं मिलता है। सारा जीवन अाभासी सत्य के पीछे भागते रहते हैं और जीवन के अंत में हकलान होकर पछताते रहते हैं। कुछ उन्हीं क्रियाकलापों में इतना रम जाते हैं कि वे मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। आइए अध्यात्म पर चर्चा करें:-
1. प्रश्न है अध्यात्म है क्या? इस विषय पर शब्द व्युत्पत्ति का सहारा न लेकर इसे समझने की कोशिश करें। अध्यात्म स्वयं को समझने की कला है। वस्तुत: हमारे सारे इंद्रिय बाहर के ज्ञान के प्रति संवेदी हैं। हम बाहर के क्रियाकलापों में इतने उलझ जाते हैं कि हमें स्वयं को समझने का समय नहीं मिलता है। इसी समझ से अध्यात्म की शुरुआत होती है। 
2. अध्यात्म में पुस्तकों का क्या महत्त्व है? कुछ भी नहीं। सच्चे साधक अब तक जो किताब पढ़ रहे थे, उसे कृपया बंद कर दें। अध्यात्म अनुभव का विषय है। अध्यात्म में ज्ञान अनुभव का पर्याय है और यह ज्ञान किताबी ज्ञान से संभव ही नहीं है। अनुभव ही ज्ञान है, स्व को समझना ही ज्ञान  है, और सारे विषय अज्ञान के क्षेत्र में आते हैं।
3. गुरु के बारे में कुछ बातें। गुरु बहुत ही  बाद का विषय है। यह अध्यात्म के मार्ग में कुछ धटित होने में सहायता करते हैं। साधक पहले ही गुरु ढूंढने की व्यर्थ चेष्टा न करें। गुरु खोजने के आपके प्रयत्न में आपको गुरु घंटाल ज्यादा मिलेंगे। आपका कीमती वक्त जाया करेंगे, खुद ऐशो आराम में रहकर आपको दीन हीन बना देंगे। देखिए गुरु मत खोजिए. वे स्वयं आपको मिल जाएंगे। पहले आप मन-प्राण-शरीर को स्व को खोजने में लगा दें। गुरु आपको मार्ग में ही मिल जाएंगे। उसके लिए पहले से ही फिक्र न करें।
4. आरंभ कैसे करें? यही महत्त्वपूर्ण विषय है। आपको स्वयं को ही खोजना है। बाहर तो आप हैं नहीं, तो आप कहाँ खोजेंगे। कुछ समय बैठिए। निर्विचार हो जाइए- उसीसे आप स्वयं को ढूंढ पाएंगे। मुख्य विषय निर्विचार होना ही है। सारे विचार इंद्रिय जन्य हैं। विचारों से ही मुक्ति से आप को स्वयं की प्राप्ति हो जाएगी। 
5. निर्विचार कैसे हो? देखिए इसका एक नियम नहीं है। आप अपनी सुभीता से कहीं एकांत में बैठकर उस मन को देखें जो आपके विचार को सरपट दौड़ाता है। देखें मन कहाँ-कहाँ से विचार पकड़ कर लाता है। उसे रोकने का प्रयास न करें, सिर्फ देखें और यही देखना आपको सभी कुछ प्राप्त करवा देगा। 
6. कुछ और बातें।  अब कुछ नहीं। ऊपर की ही बातों को ध्यान में रखें। रास्ता आपको खुद ही मिल जाएगा- आगे गुरु भी मिलेंगे। ज्यादा समझने से उलझन बढ़ेगी। इसीलिए नित्यप्रति इसीका अभ्यास कीजिए।
इत्यलम्।

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