गुरुवार, 26 जनवरी 2012

सच्चा गणतंत्र

 
आज प्रजातंत्र का उल्लास है. लोग सड़कों पर खड़े होकर झांकियां देख रहे हैं. देश के शहीदों को याद किया जा रहा है. यह देखो हवाई जहाज कैसे कुलाचे भर रहा  है. हमारा भारत महान है. विविधता इसकी संस्कृति है. लेकिन आँखें नम हैं, हम कैसे इतने बड़े जहाज को डुबाने के लिए श्रम कर रहे हैं.
कुमकुम लेपूं किसे सुनाऊँ किसको कोमल गान
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान
आज हमारी सीमा को लांघने का प्रयास किया जा रहा है. हमें ग़ुरबत में रखने के लिए घर के भेदिये ही प्रयत्न कर रहे हैं. हम लालची निगाहों से डालर को देखते हैं. हमारे भविष्य चंद विकसित देश तय कर रहे हैं. गांधीजी का यह देश उनके बताये मार्गों को भूल गया.  हम धीरे धीरे मानसिक और आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं. नैतिक पतन तो कई दशक पहले हो गया. दोस्तों, यह समय अपना अपना देखने का नहीं है. हम जात बिरादरी से ऊपर हैं, हम प्रांतीय नहीं हैं, भारतीय हैं और सिर्फ भारतीय.  विविधता हमें तोड़ने के लिए नहीं, हमें अपने पर गर्व करने के लिए है. हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर देश और सिर्फ देश के लिए काम करना होगा. हम किसी पार्टी का समर्थन न करें, सिर्फ चरित्रवान व्यक्तियों को आगे लायें जिनमे घर भरने की लालसा न हो.  हम सिर्फ विरोध के लिए विरोध न करें, दुखितों अनाश्रितों और असहायों की सहायता करें. उनके दुःख को अपना दुःख समझें. हमें अपने समाज से टूटते हुए ताने बाने को फिर से संवारना है. दोस्तों, यदि कोई आपके राज्य में तंगहाली से मर रहा है या भूख और गर्दिश का शिकार हो रहा है, तो यह आपकी जिम्मेदारी है, उसके दुःख को दूर करने की, उसकी  खोयी अस्मिता लौटाने की.  सिर्फ सरकार और शासन का मुंह जोहने से काम नहीं चलेगा. हमारी निष्क्रियता ही हमारे देश की बर्बादी का कारण है. हमें जरूरत है स्वामी विवेकानंद की, भगत सिंह की, ऐसे चरित्र वान की जो देश के लिए फना हो सकें. हमें धन्नासेठों की आवश्यकता नहीं है, नहीं चाहिए हमें फोर्ब्स में दर्ज चंद शोषकों के नाम, ये अट्टालिकाएं, करोड़ों के कार और स्विस बैंकों में जमा अकूत खजाना जो  किसानों बेबस मजदूरों के खून से सने हैं. उन्हें  दोजख मिलेगा. भाड़ में जाएँ उनकी काली करतूत.  हमें आस पास की दुनिया को संवारना है. लोगो के झूठे नारों में नहीं आना है. हम देश के नागरिक हैं, उसके हवा पानी मिट्टी से रचे बसे हैं, मुझे ही अनाथों की सहायता करनी है, देश के नागरिक के दुखों को अपना दुःख समझना है. तभी देश सच्चे स्वर्णिम भविष्य के लिए आगे कदम बढ़ा सकेगा.

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