भाषा की विभिन्नता ने जहाँ हमें मानसिक रूप से उन्नत बनाया, शब्दों की संप्रेशंता को सटीक बनाया, वहीँ कुछ कन्फ्यूजन भी पैदा कर गया. सही ढंग से वस्तुओं या किसी कार्य प्रणाली को समझने समझाने का तरीका शब्द के आडंबरों ने ढँक लिया. यह तब हुआ जब हमने बुद्धि का उपयोग शब्दों का प्रयोग अहंकार को बढाने के लिए करना शुरू किया. एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाएगा. इश्वर को ही लें. वे परम सत्ता हैं और अपनी जगत सत्ता में वे चेतनता के रूप में रहते हैं. जाहिर हैं उससे संपूर्ण ब्रह्माण्ड ओत प्रोत है. जड़ जंगम और अणु परमाणु भी उनसे अछूते नहीं हैं. वे कारण स्वरुप हैं अतः उससे उत्पन्न कार्यस्वरूप भी उन्हीं का रूप है. अब चूंकि वे सर्व विद्यमान हैं उसे स्पष्ट करने के लिए जो ताना बाना बुना गया वह समझने समझाने से बहुत दूर चला गया. जैसे वे वृहद और सूक्ष्म हैं - वे अस्ति और नास्ति हैं- कारण और कार्य हैं- वे जल-थल-नभ में हैं- आदि आदि. अब शब्दों और उनके विलोमों का प्रयोग इश्वर को समझाने में इतना हुआ कि इश्वर ही कहीं खो गए और शब्दों के जाल में फँस गए. यानि कि इश्वर जो सहज है उन्हें शब्दालंकार ने असहज कर दिया.
इश्वर समझने की नहीं महसूस करने की बात है. उसे शब्दों में जितना बांधेंगे वे आपसे दूर होते चले जायेंगे- वे सूक्ष्म में अपने गुणों एवं कारण स्वरुप में हैं- जिन्हें खींच खींच कर हमने दुरूह बना दिया है. ब्रह्माण्ड और संपूर्ण सृष्टि चेतन है- अतुलनीय है और तुलनात्मक रूप में नहीं है. लेकिन समझाने के लिए हम एक दुसरे से तुलना करने लगते हैं और वहीँ हम विषय से भटक जाते हैं. फिर अनुभव की सीमा भी है- आप का शरीर सीमित है और सीमा के अंतर्गत ही आपका अनुभव है. अब अपनी सीमा को न पहचानकर बुद्धि विलास का प्रयोग करने लगते हैं. आपके सारे कांसेप्ट आपकी सीमा के अंतर्गत हैं- अतः आप अपनी सीमा में ही इश्वर को पहचानने का दंभ भर सकते हैं. अतः आवश्यक है- महसूस करने को ही विस्तार दें- अपनी सीमा को ही जहाँ तक हो सके -खीचें और यह मान कर चलें कि शरीर मन-बुद्धि से हम सीमित अर्थों में ही इसे पहचान सकेंगे. पहचानना एक छुअन भर - इससे बढ कर कुछ भी नहीं- जिन्हें समझना चाह रहें हैं- उन्हें ही समझाने दें- तब बात बनेगी. इत्यलम
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